पवित्र सरोवर के मध्य सुशोभित ‘सिल्वर टेम्पल’ के नाम से विख्यात श्री दुर्ग्याणा तीर्थ। इसका शिलान्यास भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी द्वारा किया गया था। यहाँ माँ दुर्गा, भगवान श्री लक्ष्मी नारायण, प्राचीन बड़ा हनुमान जी मंदिर एवं माँ शीतला मंदिर का अलौकिक विग्रह स्थापित है।
“जीवन में चार धाम की यात्रा करना अनिवार्य माना गया है।”
हिमालय की गोद में स्थित मोक्षदायक पावन धाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री एवं भारत के चार प्रमुख धाम)
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् — समस्त १२ स्वयंभू ज्योतिर्लिंग
चंद्रदेव द्वारा स्थापित एवं समुद्र तट पर स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग। यहाँ दर्शन से समस्त व्याधियों का नाश होता है।
काल के भी काल महाकाल, एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग। यहाँ की विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती काल मृत्यु को टालती है।
भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी मोक्षनगरी काशी। गंगा तट पर स्थित विश्वेश्वर के दर्शन मात्र से जीव भवबंधन से मुक्त होता है।
पवित्र नर्मदा नदी के तट पर ॐ आकार के पर्वत पर स्थित ज्योतिर्लिंग। ओंकारेश्वर और ममलेश्वर के युगल दर्शन।
भगवान श्री राम द्वारा लंका विजय पूर्व बालू से प्रतिष्ठित शिवलिंग। मंदिर के २२ पवित्र तीर्थ कुंडों में स्नान महापुण्यदायी है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों के त्रिमुख रूप ज्योतिर्लिंग। कालसर्प दोष व नारायण नागबलि पूजा का प्रमुख केंद्र।
कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल शिखर पर स्थित। ज्योतिर्लिंग व शक्तिपीठ (भ्रमराम्बा) का दुर्लभ पावन संगम।
मंदाकिनी नदी उद्गम पर स्थित हिमालय का सर्वोच्च ज्योतिर्लिंग। मोक्षदायिनी अलौकिक तपोस्थली।
भीमा नदी के उद्गम पर स्थित। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर दैत्य के वध उपरांत यहाँ विश्राम किया था।
रावणेश्वर धाम। सावन मास में सुल्तानगंज से १०० किमी उत्तरवाहिनी गंगाजल कांवर यात्रा का विश्वप्रसिद्ध तीर्थ।
समस्त विष, सर्पभय और व्याधियों का शमन करने वाले नागेश्वर महादेव। द्वारकापुरी के समीप स्थित।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अंतिम पावन ज्योतिर्लिंग। घुश्मा की अटूट भक्ति से प्रकट होकर शिव जी ने पुत्र को नवजीवन दिया।
यात्रा के दौरान सात्विक, फलाहारी भोजन करें। मन में क्रोध, ईर्ष्या का त्याग कर निरंतर प्रभु नाम का स्मरण करें।
पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करते समय सूर्य व पूर्वजों का ध्यान कर वैदिक विधि से संकल्प लें।
तीर्थ क्षेत्र में ब्राह्मण, संत और दीन-दुखियों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा देना अनंत कोटि पुण्य फलदायी है।