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“अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥”
माता जानकी ने लंका में श्री हनुमान जी की अनन्य निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें समस्त 8 सिद्धियों और 9 निधियों का स्वामी व दाता होने का अमर वरदान दिया था।
शरीर को अणु (परमाणु) के समान सूक्ष्म कर लेना। लंका में प्रवेश हेतु हनुमान जी ने ‘मसक समान रूप’ धारण किया था।
शरीर को पर्वताकार और असीम विस्तार देना। सुरसा के मुख के सम्मुख हनुमान जी ने अपने शरीर को सौ योजन तक विस्तृत किया था।
शरीर को इतना भारी बना लेना जिसे त्रिलोकी की कोई शक्ति हिला न सके। महाभारत में महाबली भीम भी हनुमान जी की पूंछ न उठा सके थे।
शरीर को रुई अथवा वायु से भी हल्का कर लेना, जिससे जल की सतह या आकाश में वायुवत सहज विचरण किया जा सके।
बिना किसी बाधा के किसी भी स्थान, लोक या अदृश्य वस्तु को तत्काल प्राप्त करने और पशु-पक्षियों की भाषा समझने की सामर्थ्य।
पृथ्वी, पाताल, जल अथवा आकाश में बिना अवरोध विचरण करना, जल पर थलवत चलना और इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करना।
समस्त चराचर जगत, जीवों, तत्वों और पदार्थों पर ईश्वरतुल्य आधिपत्य, शासन और सृष्टि के नियमों को संचालित करने की शक्ति।
प्रत्येक प्राणी, परिस्थिति और विरोधी शक्तियों को अपने वशीभूत और अनुकूल कर लेना। इंद्रियों और मन पर पूर्ण विजय।