अतुलित बलधामा, भगवान शिव के एकादश रुद्रावतार, श्रीराम के अनन्य सेवक और अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
मूल मंत्र: ॐ हं हनुमते नमः
प्रिय भोग: बूंदी के लड्डू, सिंदूर, चमेली का तेल, पान का बीड़ा
त्रिलोचन, नीलकंठ, आदि-अनंत, योगेश्वर और संहारक महादेव। केवल जल और बेलपत्र से प्रसन्न होने वाले आशुतोष।
मूल मंत्र: ॐ नमः शिवाय
प्रिय भोग: भांग, धतूरा, श्वेत मिष्ठान, पंचामृत
महिषासुरमर्दिनी, नवदुर्गा स्वरूपा, संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल प्रकृति और शक्ति का परम अधिष्ठान।
मूल मंत्र: ॐ दुं दुर्गायै नमः
प्रिय भोग: हलवा-पूरी, चना, लाल चुनरी, अनार
रिद्धि-सिद्धि के दाता, बुद्धि के अधिष्ठाता, सभी मांगलिक कार्यों में सर्वप्रथम पूजे जाने वाले लंबोदर।
मूल मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः
प्रिय भोग: मोदक, दूर्वा, मोतीचूर लड्डू, लाल पुष्प
अयोध्या नरेश, धर्म के साक्षात् विग्रह, सत्य, न्याय और करुणा के परम आदर्श प्रभु श्री रामचंद्र।
मूल मंत्र: ॐ रां रामाय नमः
प्रिय भोग: पंचामृत, तुलसीदल, फल, खीर
गीता के अमर उपदेशक, प्रेम व कर्मयोग के अवतार, सोलह कलाओं के अधिपति भगवान वासुदेव कृष्ण।
मूल मंत्र: ॐ क्लीं कृष्णाय नमः
प्रिय भोग: माखन-मिश्री, पंजीरी, तुलसीदल, पेड़ा
संस्कृत में ‘कोटि’ शब्द के दो अर्थ होते हैं: कोटि = करोड़ और कोटि = प्रकार (Categories)। वेदों एवं शास्त्रों में मूलतः 33 प्रकार के ही प्रमुख देवता बतलाए गए हैं।
देवमाता अदिति के 12 तेजस्वी पुत्र:
धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान, पूषा, सविता, अंशुमान, भग, त्वष्टा, विष्णु।
आठों दिशाओं में प्रकाशमान देवता:
आप (जल), ध्रुव (नक्षत्र), सोम (चन्द्र), धर (पृथ्वी), अनिल (वायु), अनल (अग्नि), प्रत्यूष (प्रभात), प्रभास (प्रकाश)।
भगवान शिव के 11 एकादश स्वरूप:
गणेश्वर, रुद्र, हर, त्र्यम्बक, अपराजिता, बहुरूप, भैरव, जयन्त, सुरेश्वर, शर्व, भीम/शम्भु।
दिव्य वैद्य व रचना के अधिष्ठाता:
नास्त्य व दस्र (देव-वैद्य अश्विनी कुमार) तथा प्रजापति-विश्वकर्मा जो समस्त सृष्टि निर्माण के कारक हैं।
धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश हेतु युग-युगान्तर में अवतरित प्रभु के 10 पावन रूप
क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान श्री हरि नारायण के चारों हाथों में धारण दिव्य आयुध सृष्टि और मोक्ष के सनातन प्रतीक हैं: